घर में था छोटा तो गुलछरे उड़ाता था |
कोई जो बोले तो उसे मुह चिढाता था ||
हुआ जो बड़ा तो घर छोड़ना पड़ा |
दुनिया दारी से जो दो चार होना पड़ा ||
बस स्टॉप पर बस का घंटो इन्तीजार करता हु |
तब जा कर एक रुपये की बचत करता हु ||
अस्तित्व अपनी बनाने की मुझे लड़नी लड़ाई है ||
नौकरी के लिए दिन भर भटकता हु |
शाम को थक कर जब कमरे पर लौटता हु ||
माँ के हाथो की रोटिया याद करता हु |
मुझे पता है वह दिन नहीं आएगा ||
दुखी होने से ये दिन भी बुरा जायेगा |
दुनिया है एक समुद्र मुझे गोते लगाना है ||
हिम्मत जुटाकर मुझे पार जाना है |
ऐसे में मै ने फिर हिम्मत जुटाई है ||
अब की बार मै परचम लहराउंगा |
अपनी पहचान दुनिया में बनाउंगा ||
मानेन्द्र कुमार भारद्वाज

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