अन्ना हजारे को कौन नही जनता | आज छोटा सा बच्चा भी अन्ना को पहचानता है | वह यह नहीं जनता की अन्ना कौन है ? क्या करते है ? लोग उनकी चर्चा क्यों करते है | लेकिन वह इतना तो जरुर जनता है कि ये सफ़ेद धोती कुर्ता पहनने वाला व्यक्ति करीब एक महीने से लगातार टी.वी पर आ रहा है | ऐसे में मेरे दिमाग में ये प्रश्न उठता है कि क्या उस समय देश में और कोई दूसरी घटना नहीं घट रही थी | अगर हा तो उन्हें क्यों नहीं दिखाया गया | आखिर सारे न्यूज़ चैनल क्यों अन्ना हजारे को दिनो रात लाइव टेलीकास्ट कर रहे थे | मै अन्ना हजारे का विरोधी नहीं हु मै केवल इतना कहना चाहता हु कि मीडिया का काम केवल आमिर खान कि फिल्म पिपली लाइव कि तरह नत्था के पीछे भागना नहीं है | खैर इस बात को मै यही विराम देना चाहूंगा | मै मीडिया के बखेड़े में नहीं पड़ना चाहता हु क्यों की मुझे मालूम है कि मीडिया वह शक्ति है जिसे चाहे अर्श से फर्श तक और फर्श से अर्श तक पंहुचा सकती है | इसके लिए मुझे नही लगता है कोई उदहारण देने की आवश्यकता है |
आज पिछले १० सालो से मणिपुर की इरोम शर्मीला सशत्र सुरक्षा विशेषाधिकार कानून के लिए भूख हड़ताल कर रही है , लेकिन सरकार है कि उनकी कोई बात सुनने को तैयार नहीं है | क्यों ? क्यों की उनके पास न अन्ना हजारे की तरह भीड़ है और न ही मीडिया का जमघट है | बहुत से लोग कहेंगे कि ऐसी बात नहीं है , तो मै उनसे यह पूछना चाहूंगा कि अगर ऐसा नहीं होता तो किसी की बात को सरकार को मानने में महज १२ दिन लगते है और किसी की बात १० साल के बाद भी नहीं मानी जाती | हद तो तब हो जाती है जब कोई अपनी छोटी सी बात को सरकार से मनवाने के लिए अपने प्राण तक त्यागने पड़ते है लेकिन सरकार के कान पर जू तक नहीं रेंगती है | खैर बात कुछ भी हो लेकिन इतनी बात तो तय है कि जिसकी लाठी उसी की भैस | अगर आप के पास भीड़ हो शक्ति हो तो आप की बात हर कोई मानेंगा | शायद स्वामी निगम नन्द के भूख हड़ताल में यही कमी रह गई थी कि उनके पास भीड़ नहीं थी | अगर होती तो शायद स्वामी निगमानंद को हरिद्वार के घाट पर गंगा में अवैध खनन और हो रहे अतिक्रमण को रोकने के लिए ११५ दिन भूखे रह कर आपने प्राणों कि आहुति नहीं देनी पड़ती लेकिन ऐसा हुआ नहीं |
इस घटना में मै ना मिडिया को दोषी मानता हु न ही सरकार को न ही जनता को क्यों कि अगर सरकार को होने वाली घटना के बारे में सूचना नहीं मिलेंगी और जनता जनार्दन का जब तक दबाव नहीं होगा तब सरकार बात मानने वाली तो है नहीं | दूसरी बात जब तक आप के पास भीड़ न हो तब तक मीडिया आप के पास आने वाली है नहीं भले ही आप का अनशन या आन्दोलन गाधीवादी तरीके से क्यों न हो | तिसरी बात मीडिया जो दिखाती है हम उसी को सच्चाई मान कर भीड़ के पिछे भेड की तरह चल देते है न दाए देखते है न बाये इसमें मीडिया का भी दोष नहीं है क्यों की हम और आप अकेले शांति तरीके से आन्दोलन करने वालो के साथ नहीं जुड़ते है | तो प्रश्न उठता है कि गलती किसकी है ? जनता की सरकार की,मीडिया की या तीनो की है ?
मानेन्द्र कुमार भारद्वाज
आज पिछले १० सालो से मणिपुर की इरोम शर्मीला सशत्र सुरक्षा विशेषाधिकार कानून के लिए भूख हड़ताल कर रही है , लेकिन सरकार है कि उनकी कोई बात सुनने को तैयार नहीं है | क्यों ? क्यों की उनके पास न अन्ना हजारे की तरह भीड़ है और न ही मीडिया का जमघट है | बहुत से लोग कहेंगे कि ऐसी बात नहीं है , तो मै उनसे यह पूछना चाहूंगा कि अगर ऐसा नहीं होता तो किसी की बात को सरकार को मानने में महज १२ दिन लगते है और किसी की बात १० साल के बाद भी नहीं मानी जाती | हद तो तब हो जाती है जब कोई अपनी छोटी सी बात को सरकार से मनवाने के लिए अपने प्राण तक त्यागने पड़ते है लेकिन सरकार के कान पर जू तक नहीं रेंगती है | खैर बात कुछ भी हो लेकिन इतनी बात तो तय है कि जिसकी लाठी उसी की भैस | अगर आप के पास भीड़ हो शक्ति हो तो आप की बात हर कोई मानेंगा | शायद स्वामी निगम नन्द के भूख हड़ताल में यही कमी रह गई थी कि उनके पास भीड़ नहीं थी | अगर होती तो शायद स्वामी निगमानंद को हरिद्वार के घाट पर गंगा में अवैध खनन और हो रहे अतिक्रमण को रोकने के लिए ११५ दिन भूखे रह कर आपने प्राणों कि आहुति नहीं देनी पड़ती लेकिन ऐसा हुआ नहीं |
इस घटना में मै ना मिडिया को दोषी मानता हु न ही सरकार को न ही जनता को क्यों कि अगर सरकार को होने वाली घटना के बारे में सूचना नहीं मिलेंगी और जनता जनार्दन का जब तक दबाव नहीं होगा तब सरकार बात मानने वाली तो है नहीं | दूसरी बात जब तक आप के पास भीड़ न हो तब तक मीडिया आप के पास आने वाली है नहीं भले ही आप का अनशन या आन्दोलन गाधीवादी तरीके से क्यों न हो | तिसरी बात मीडिया जो दिखाती है हम उसी को सच्चाई मान कर भीड़ के पिछे भेड की तरह चल देते है न दाए देखते है न बाये इसमें मीडिया का भी दोष नहीं है क्यों की हम और आप अकेले शांति तरीके से आन्दोलन करने वालो के साथ नहीं जुड़ते है | तो प्रश्न उठता है कि गलती किसकी है ? जनता की सरकार की,मीडिया की या तीनो की है ?
मानेन्द्र कुमार भारद्वाज
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