Tuesday, September 27, 2011

आखिर इतना क्यों मजबूर हो गई |

जब भी तुम्हे अपना बनाने की बात किया करता था |
तुम तो अक्सर मुझे भुला दिया करती थी |
खुद ही मुझे बेवफा कहा करती थी |
मेरा कसूर केवल इतना था कि ,
जिन्दगी  के हर एक मोड़ पर तुमे याद करता था | 
तुमे अपना बनाने की बात करता था | 

तुम्हे तो याद होगा , जब गलियों में रात हुआ करती थी |
तब हमारी अँधेरे में मुलाकात हुआ करती थी |   
तब तो तुम्हे अमावश की रात भी अच्छी लगाती थी |
मेरे कही हुई हर बात अच्छी लगाती थी | 
फिर ऐसा क्या हुआ जो दूर हो गई|
आखिर इतना क्यों मजबूर हो गई |

अब तो मै तेरी हर एक छुवन को याद करता हु |
तनहाइयो में अक्सर तुम से बात करता हु | 
तेरी गर्म सासों में जब मैंने अपनी सासों को समाया था |
उस समय हम ने  एक दुसरे में जहा को पाया था | 
चादनी रातो में हजारो वादे किया करते थे | 
एक दुसरे का साथ निभाने की कसमे खाया करते थे |
फिर ऐसा क्या हुआ जो दूर हो गई | 
आखिर इतना क्यों मजबूर हो गई |  


मानेन्द्र कुमार भारद्वाज
  

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