केंद्र सरकार को अभी अन्ना के जनलोकपाल बिल से निजात मिला भी नहीं था कि सरकार महंगाई और एफडीआई के चक्र में कुछ इस तरह फंसी की पुरे देश में केंद्र सरकार के खिलाफ विरोध देखने को मिला | लिहाजा केंद्र सरकार मौजूदा दौर में अपने आप को पांच राज्यों के विधान सभा चुनाव में अपनी गिरती शाख को बचाने के लिए सरकार ने एफडीआई मसले पर पुनः विचार करने की बात कह कर कुछ मामले को शांत करने की कोशिश कर ही रहा था कि सोशल नेटवर्किंग के नियंत्रण के मामले ने एक बार फिर केंद्र सरकार को लोगों के आलोचनाओ का पत्र बना दिया |
दरअसल सोशल नेटवर्किंग वेबसाइटों पर लगातार केंद्र सरकार के खिलाफ लोगों की तीखी प्रतिक्रियाओं को देखकर केंद्र सरकार ने फेसबुक, गूगल और ऑरकुट जैसी कई सोशल नेटवर्किंग वेबसाइटों पर शिकंजा कसने की बात कह दी | जिसे दूरसंचार मंत्री कपिल सिब्बल ने धार्मिक आस्थाओं के साथ खिलवाड़ की बात कह कर इन वेबसाइटों पर लगाम लगाने की बात कही क्यों कि भारत में दस करोड़ लोग सोशल साइटों का प्रयोग करते है | जिससे जाहिर सी बात है कि इतने ज्यादा लोगों का सरकार के प्रति नाराजगी से केंद्र सरकार को लगा होगा की आगामी चुनाव परिणाम पर इसका बुरा असर पड़ सकता है | इसके लिए सरकार ने फेसबुक, गूगल और ऑरकुट जैसी कई सोशल नेटवर्किंग वेबसाइटों वाली कंपनी से इनपर रोक लगाने को कहा है | सरकार ने ये भी कहा अगर यह वेबसाइटे ऐसा नहीं करती है तो वह इसके खिलाफ कानून भी बनायेंगे |
प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी समेत तमाम कांग्रेस नेताओं के खिलाफ आपत्तिजनक टिप्पणियों और तस्वीरों को लेकर सरकार को ऐतराज है लेकिन देश की जनता की खून पसीने की कमाई जब सफ़ेद कुर्ते और सरकारी मुलाजिम डकार कर हजम कर जाते है तो उनको इस बात के लिए ऐतराज नहीं होता है | अगर ये बात उनसे पूछा जाय तो वह बड़े चतुराई से ये कहेंगे कि इसके लिए कानून है और हम क़ानूनी कार्यवाही कर रहे हैं | तो साहब साइबर क्राइम के लिए और गलत , अश्लील या गन्दी सामग्री वेबसाइटों पर डालने के लिए भी कानून है फिर अलग से कानून बनाने की क्या जरुरत है | अगर आप को गलत और अश्लील या भद्दे सामग्री वेबसाइट पर डालने वाले के खिलाफ कार्यवाही करनी है , तो आप आरटीआई की धारा -79 के तहत क़ानूनी कार्यवाही कर सकते हैं | रही बात कानून बनाने की तो अभी सरकार के लिए जन लोकपाल का बिल पड़ा हुआ है |
देश में व्यक्ति को स्वतंत्र अभिव्यकित की पूरी आजादी है लेकिन जिस तरह से केंद्र सरकार अपने हथकंडे अपना रही है उससे तो नहीं लगता है कि देश में स्वतंत्र अभिव्यकित की पूरी आजादी है | सोशल नेटवर्किंग वेबसाइटे एक ऐसी साइट है जहाँ पूरी दुनिया के लोग बिना किसी डर के अपनी राय रखते हैं और अपना गुस्सा जाहिर करते हैं | ऐसे में कभी - कभी लोग अपशब्द शब्दों का प्रयोग भी कर देते है | जो गलत है, लेकिन इसके लिए कोई अलग कानून बनाये ये कहा तक सही है |
सोशल नेटवर्किंग वेबसाइट लोगों को आपस में जोड़ने में महत्त्व पूर्ण भिमिका निभाता है | अरब क्रांति के दौरान इन साइटों ने लोगों को एक मंच पर लाने में महत्त्व पूर्ण योगदान दिया है | अन्ना का आन्दोलन हो या फिर तुर्की और जापान में आये इस साल विनाशकारी भूकंप में लोगों को आपस में मिलाने का काम हो लोगों ने इस साइटों के प्रयोग से एक दुसरे की खैरियत जानी | खुद केंद्र सरकार भी पिछले चुनाव में इन साइटों का बखूबी प्रयोग किया है |
हर चीज के दो पहलू होते है एक अच्छा दूसरा बुरा | ये तो प्रयोग करने वाले पर निर्भर करता है कि वह किस कार्य के लिए इसका प्रयोग कर रहा है | जनवरी 2008 में खुलासा ,फेसबुक पर खालिस्तान समर्थको ने बना रखे है पेज | फ्लिकर पर कई आपतिजनक तस्वीरों के पोस्ट किया गया है | तो वही कश्मीरी अलगावादियों ने अपने कई ब्लॉग बनाये है जिस पर इस मसले पर चर्चा होता है | तो वही सोशल नेटवर्किंग वेबसाइटों पर मौजूदा समय में सबसे ज्यादा 60 प्रतिशत छात्र पढाई के बारे में बात करते है | रही बात सोशल नेटवर्किंग वेबसाइटों पर लगाम लगाने की तो कई लोगों की मिलीजुली प्रतिक्रिया रही है | क्यों कि सोशल नेटवर्किंग वेबसाइटों का फैलाव इतना बड़ा है कि इसपर नजर रखन काफी नामुम्किन सा दिखता है | ऐसे में लोगों से यही कह जा सकता है कि वह ऐसी तस्वीरे और भाषा का प्रयोग न करे जो मानवता का का उल्लंघन करे | लेकिन अगर सोशल नेटवर्किंग वेबसाइटों पर व्यक्त टिपणीयों पर लगाम लगाया तो ये कही न कही लोगों के मूलभूत अधिकारों का हनन होगा |
मानेन्द्र कुमार भारद्वाज
(ये लेखक के अपने विचार है | )
(ये लेखक के अपने विचार है | )

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